भगत सिंह का घर को अलविदा : पिता जी के नाम पत्र

1923 में भगतसिंह, नेशनल कॉलेज, लाहौर के विद्यार्थी थे। जन-जागरण के लिए ड्रामा-कलब में भी भाग लेते थे। क्रान्तिकारी अध्यापकों और साथियों से नाता जुड़ गया था। भारत को आज़ादी कैसे मिले, इस बारे में लम्बा-चौड़ा अध्ययन और बहसें जारी थीं। घर में दादी जी ने अपने पोते की शादी की बात चलायी। उनके सामने […]

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भगत सिंह का: गुरुमुखी में लिखा पहला पत्र : चाची के नाम

13 अप्रैल, 1919 को जलियाँवाला बाग़ में अंग्रेज़ों ने बर्बर कत्लेआम किया। 12 वर्षीय भगतसिंह दूसरे दिन वहाँ गये और रक्त-सनी मिट्टी लेकर घर लौटे, तो कई सवाल उनके मन में थे। अपनी छोटी बहिन बीबी अमरकौर से उन्होंने अपने मन की बातें कीं। 21 फरवरी, 1921 को महन्त नारायणदास ने ननकाना साहिब में 140

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भगत सिंह: दादा जी के नाम एक और पत्र

लाहौर, 14 नवम्बर, 1921 मेरे पूज्य दादा साहब जी,नमस्ते। अर्ज़ यह है कि इस जगह खैरियत है और आपकी खैरियत श्री परमात्मा जी से नेक मतलूब हूँ। अहवाल ये है कि मुद्दत से आपका कृपा-पत्र नहीं मिला। क्या सबब है? कुलबीर सिंह, कुलतार सिंह की खैरियत से जल्दी मुत्तला फ़रमायें। बेबे साहबा अभी मेराँवाली से

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काकोरी के वीरों से परिचय

9 अगस्त, 1925 को शहीद रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला और उनके अन्य क्रान्तिकारी साथियों ने क्रान्तिकारी पार्टी के लिए धन इकट्ठा करने के उद्देश्य से लखनऊ के करीब काकोरी के पास रेलगाड़ी रोक सरकारी खज़ाना लूटा। इसके बाद चन्द्रशेखर आज़ाद के अलावा बाक़ी सभी क्रान्तिकारी पकड़ लिए गये। भगतसिंह भी तब कानपुर निवास के समय हिन्दुस्तानी

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काकोरी के शहीदों की फाँसी के हालात

जनवरी, 1928 के ‘किरती’ में भगतसिंह ने एक और लेख काकोरी के शहीदों के बारे में ‘विद्रोही’ के नाम से लिखा – 17 दिसम्बर, 1927 को श्री राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को गोंडा जेल में फाँसी दी गयी और 19 दिसम्बर, 1927 को श्री रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ को गोरखपुर जेल में, श्री अशफ़ाक़उल्ला को फैज़ाबाद जेल में और

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मैं नास्तिक क्यों हूँ?

(भगतसिंह ने जेल में यह लेख 5-6 अक्टूबर, 1930 को लिखा था। यह पहली बार लाहौर से प्रकाशित अंग्रेज़ी पत्र ‘द पीपुल’ के 27 सितम्बर 1931 के अंक में प्रकाशित हुआ था। इस महत्वपूर्ण लेख में भगतसिंह ने सृष्टि के विकास और गति को भौतिकवादी समझ पेश करते हुए उसके पीछे किसी मानवतर ईश्वरिय सत्ता

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शहीद भगतसिंह का दादा जी के नाम एक और पत्र

लाहौर, 27 जुलाई, 1919 श्रीमान पूज्य दादा जी,नमस्ते! अर्ज़ है कि ख़ैरियत है और आपकी ख़ैरियत श्रीनारायण जी से नेक मनाया करता हूँ। अहवाल यह है कि हमारा छमाही इम्तिहान हो गया, जो जुलाई से शुरू हुआ था। हिसाब के पर्चे में बहुत लड़के फेल हो गये थे, इसलिए हमारा हिसाब का इम्तिहान नौ अगस्त

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दादा जी के नाम एक पत्र

शहीद भगतसिंह का जन्म 28 सितम्बर, 1907 को हुआ। उस समय उनके चाचा अजीत सिंह को लाला लाजपतराय के साथ किसान-आन्दोलन का प्रतिनिधित्व करने पर अंग्रेज़ सरकार ने मांडले (बर्मा) में निर्वासित कर रखा था। जनता के रोष के आगे झुकते हुए नवम्बर, 1907 में उन्हें रिहा किया गया। पिता किशन सिंह को अंग्रेज सरकार

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फाँसी से पहले साथियों को भगतसिंह का अंतिम पत्र

साथियो, स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता। लेकिन मैं एक शर्त पर ज़िन्दा रह सकता हूँ, कि मैं कैद होकर या पावंद होकर जीना नहीं चाहता। मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा

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